लगभग छह महीने में 11 संस्थानों में 12 छात्रों ने की आत्महत्या
चिकित्सकों की आत्महत्या की खबरें चिंताजनक; व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न
देश के चिकित्सा संस्थानों में मेडिकल छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों की आत्महत्या की खबरें चिंताजनक हैं। यह सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। जब जीवन बचाने वाले ही जीवन से हारने लगें, तो हमें इस व्यवस्था पर गहराई से विचार करना होगा। यह समस्या नई नहीं है, लेकिन इसकी पुनरावृत्ति रोकना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। लगभग छह महीने की अवधि में, मार्च से 24 सितंबर के बीच, देश भर के 11 मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में 12 पीजी रेजिडेंट, जूनियर और मेडिकल छात्रों ने आत्महत्या की। यह भयावह आंकड़ा 26 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट से सामने आया। रिपोर्टों में लगातार लंबी ड्यूटी, पढ़ाई का भारी दबाव और रैगिंग जैसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है। इन गंभीर परिस्थितियों को व्यक्तिगत असफलता या कमजोरी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह चिंता का विषय है कि आज भी वही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि इतनी लंबी ड्यूटी के बाद कोई चिकित्सक स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से कितना संतुलित रख सकता है। इतने वर्षों बाद भी यदि चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की कार्य-संस्कृति में वास्तविक परिवर्तन न आया हो, तो यह ठहरकर सोचने का विषय है। डॉक्टरों के सामने चुनौती केवल लंबी ड्यूटी तक सीमित नहीं है। चिकित्सकों को प्रतिदिन बीमारी, पीड़ा और मृत्यु से रूबरू होना पड़ता है। गंभीर मरीजों की बिगड़ती स्थिति, किसी मरीज की मृत्यु, परिजनों का आक्रोश, संसाधनों की कमी और उपचार से जुड़े कठिन निर्णय उनके मानसिक संसार पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इन सब को केवल 'प्रोफेशनल ड्यूटी' कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। भी मनुष्य हैं, उन्हें भी थकान, तनाव, भय और मानसिक पीड़ा महसूस करने का अधिकार है। हमारे यहाँ अक्सर यह कहा जाता है कि को मजबूत होना चाहिए। निस्संदेह, चिकित्सक में कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और आपात स्थिति में नेतृत्व करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन मजबूत होने का अर्थ यह नहीं कि उसे थकान, तनाव, भय या मानसिक पीड़ा महसूस करने का अधिकार ही न हो। भी मनुष्य हैं और उन्हें भी पर्याप्त नींद, विश्राम, सम्मान, संवाद और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। रेजिडेंट डॉक्टरों पर किए गए एक अध्ययन के आंकड़े भी चिंता पैदा करते हैं। इस अध्ययन में बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने नींद पूरी न होने, लगातार लंबी ड्यूटी और अत्यधिक तनाव की शिकायत की। कुछ डॉक्टरों ने तो आत्महत्या के विचार आने की बात भी स्वीकार की। ये आंकड़े केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि हमारी चिकित्सा व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। यह समस्या नई नहीं है। लगभग दो दशक पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में मेरे पिता के इलाज के दौरान मुझे स्वयं एक रेजिडेंट के अत्यधिक तनाव और चिड़चिड़े व्यवहार का अनुभव हुआ। बाद में बातचीत से पता चला कि रेजिडेंट डॉक्टरों की लगातार 25-30 घंटे तक ड्यूटी सामान्य बात मानी जाती थी। तब भी प्रश्न यही था कि इतनी लंबी ड्यूटी के बाद कोई चिकित्सक स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से कितना संतुलित रख सकता है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग और संबंधित संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियम एवं प्रावधान इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असली चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नियमों की संख्या से नहीं, बल्कि उन नियमों के जमीन पर उतरने से तय होती है। इस दिशा में कुछ संस्थागत कदम तत्काल प्रभाव से मजबूत किए जाने चाहिए। पहला, लंबी और लगातार ड्यूटी की नियमित समीक्षा हो तथा पर्याप्त विश्राम और शिफ्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि डॉक्टरों को अपनी ड्यूटी के दौरान पर्याप्त आराम मिले और उनकी कार्य-अवधि तर्कसंगत हो, जिससे वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकें। दूसरा, मेडिकल छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए नियमित काउंसलिंग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था हो। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि पेशेवर स्वास्थ्य का अनिवार्य हिस्सा माना जाना चाहिए। यह सहायता उन्हें तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने और अपनी भावनाओं को स्वस्थ तरीके से व्यक्त करने में मदद करेगी। तीसरा, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के साथ मानसिक स्वास्थ्य की भी समय-समय पर स्क्रीनिंग की जाए। यह प्रणालीगत दृष्टिकोण डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य की प्रारंभिक पहचान और हस्तक्षेप में सहायक होगा, जिससे गंभीर समस्याओं को रोका जा सकेगा। चौथा, प्रत्येक चिकित्सा संस्थान में प्रभावी और स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र हो, जहाँ रैगिंग, उत्पीड़न, बुलिंग, अपमानजनक व्यवहार और अनुचित कार्यभार से जुड़ी शिकायतें सुरक्षित तरीके से दर्ज की जा सकें। यह डॉक्टरों के लिए एक सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करेगा और उन्हें भावनात्मक समर्थन प्रदान करेगा। पांचवां, ‘मेंटोर-मेंटी सिस्टम’ को प्रभावी बनाया जाए। प्रत्येक जूनियर या रेजिडेंट को ऐसा प्रशिक्षित फैकल्टी मेंटर मिले, जिसके साथ वह अकादमिक के साथ-साथ व्यक्तिगत और पेशेवर कठिनाइयों पर भी खुलकर संवाद कर सके। यह मार्गदर्शन और समर्थन उन्हें जटिलताओं से निपटने में मदद करेगा। छठा, मरीजों और उनके परिजनों की तरह डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता की संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए। यह प्रणालीगत समर्थन डॉक्टरों को मानसिक आघात और तनाव से उबरने में मदद करेगा, जिससे वे बेहतर सेवाएं दे सकें। सातवां, संस्थानों के नेतृत्व की जवाबदेही केवल परीक्षा परिणाम, शोध और अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित न रहे। विभागाध्यक्ष और संस्थान के नेतृत्व को कार्यस्थल के वातावरण, कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-संस्कृति के लिए भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। यह नेतृत्व की भूमिका को व्यापक बनाएगा। को केवल ‘सेवा प्रदाता’ मानने के बजाय हमें उसे एक संवेदनशील मनुष्य और प्रशिक्षित पेशेवर के रूप में देखना होगा। यह दृष्टिकोण डॉक्टरों के प्रति सम्मान और सहानुभूति को बढ़ावा देगा। जो दिन-रात दूसरों की धड़कन बचाने में लगा है, उसकी अपनी धड़कन को भी सुनना होगा। जो मरीज से पूछता है—“आपको कैसा महसूस हो रहा है? ”—उसी तरह संस्थानों के अकादमिक और प्रशासनिक नेतृत्व को भी कभी-कभी से पूछना चाहिए—“आप कैसा महसूस कर रहे हैं? ” यह सवाल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील चिकित्सा व्यवस्था की पहचान होना चाहिए। हमें ऐसी कार्य-संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें चिकित्सक लंबे समय तक स्वस्थ, संवेदनशील और सक्षम रह सकें। आखिरकार, मरीज की सुरक्षा और का मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। एक स्वस्थ चिकित्सक ही बेहतर निर्णय ले सकता है, बेहतर संवाद कर सकता है और बेहतर चिकित्सा सेवा दे सकता है। इसलिए डॉक्टरों की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की मूल आवश्यकता है। जो लोग दूसरों का जीवन बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनके जीवन की रक्षा करना केवल संस्थानों का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। चिकित्सकों के सामने चुनौती केवल लंबी ड्यूटी तक सीमित नहीं है। वे प्रतिदिन बीमारी, पीड़ा और मृत्यु से रूबरू होते हैं। गंभीर मरीजों की स्थिति, मरीज की मृत्यु, परिजनों का आक्रोश, संसाधनों की कमी और उपचार से जुड़े कठिन निर्णय उनके मानसिक संसार पर प्रभाव डालते हैं। इसे केवल ‘प्रोफेशनल ड्यूटी’ कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। निश्चित रूप से, चिकित्सक में कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और आपात स्थिति में नेतृत्व करने की क्षमता होनी चाहिए।




