भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के इतिहास को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि देश कभी भी ‘सॉफ्ट स्टेट’ नहीं रहा। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में भारत ने पाकिस्तान से सैन्य टकराव का सामना किया, चीन के साथ सीमा विवादों को सुलझाने का प्रयास किया, हैदराबाद में निजाम की चुनौती को स्वीकार किया और गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया। इन सब घटनाओं के दौरान, सेना का प्रयोग करने में नेहरू कतई नहीं झिझके। इसी काल में नगा बगावत की शुरुआत हुई, जिस पर काबू पाने के लिए उन्होंने सेना भेजने और अफस्पा जैसे कानून लागू करने में कोई संकोच नहीं किया। यह अफस्पा कानून आज भी चर्चा का विषय बना रहता है, और इसकी शुरुआत नेहरू के कार्यकाल में ही हुई थी। नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में पाकिस्तान की सैन्य घुसपैठ का मजबूती से जवाब देकर भारत को एक ‘हार्ड स्टेट’ के रूप में स्थापित किया। उनके उत्तराधिकारी इंदिरा गांधी ने तो भारत को सैन्य शक्ति के मामले में एक नई ऊंचाई दी। 1971 के युद्ध में उनकी भूमिका निर्णायक रही, जिसने बांग्लादेश के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। मिजो बागियों के खिलाफ वायुसेना के इस्तेमाल का आदेश देना, भले ही नागरिकों के खिलाफ सेना के प्रयोग पर नैतिक बहस को जन्म दे, लेकिन यह निश्चित रूप से एक ‘हार्ड स्टेट’ की निशानी थी। उन्होंने सियाचिन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी कड़े कदम उठाए। इंदिरा गांधी के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। हालांकि उन्हें एक शांतिवादी नेता माना जाता था, लेकिन उनकी सरकार ने ही जैगुआर जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद का आदेश दिया था, जो आज भी भारतीय वायुसेना की रीढ़ हैं। यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भारत ने कभी भी समझौता नहीं किया। राजीव गांधी के कार्यकाल में भारत की सैन्य शक्ति का प्रयोग न केवल देश की सीमाओं के भीतर, बल्कि विदेश में भी हुआ। श्रीलंका में शांति सेना भेजना और मालदीव में तख्तापलट को रोकना इसके उदाहरण हैं। राजीव गांधी ने रक्षा पर अभूतपूर्व खर्च किया, उनके कार्यकाल में रक्षा बजट सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4% की सीमा को लांघ गया। उन्होंने भारत को न केवल एक ‘हार्ड स्टेट’ बनाया, बल्कि एक हस्तक्षेपकारी शक्ति के रूप में भी स्थापित किया। 1990 के दशक की शुरुआत में, जब पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों की धमकी दी, तब वीपी सिंह की सरकार ने भी कड़ा रुख अपनाया। नरसिम्हा राव ने पंजाब और कश्मीर में उग्रवाद को समाप्त करने और अमेरिका के साथ संबंधों को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारत की ‘हार्ड स्टेट’ के रूप में छवि और मजबूत हुई। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत ने दो बेहद साहसिक और जोखिम भरे फैसले लिए: पोकरण में परमाणु परीक्षण करना और अमेरिका के साथ ऐतिहासिक परमाणु संधि करना। ये कदम भारत की सामरिक स्वायत्तता और सैन्य क्षमता को दर्शाते हैं। ये निर्णय बताते हैं कि भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कभी भी किसी बाहरी दबाव के आगे घुटने नहीं टेके। इन फैसलों ने भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत के तेवर और भी सख्त हुए हैं।
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रक्षा इतिहास की पड़ताल: भारत ने हमेशा एक 'हार्ड स्टेट' की तरह काम किया
8 अक्टूबर 2026 को 12:19 am बजे

रक्षा इतिहास की पड़ताल: भारत ने हमेशा एक 'हार्ड स्टेट' की तरह काम किया
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