अजन्मी बेटियों का तर्पण: संवेदनाओं को झकझोरती पहल
वाराणसी में पितृपक्ष के दौरान एक अनूठी पहल ने समाज के अंतर्मन को झकझोर दिया है। यह पहल न केवल पूर्वजों के तर्पण और स्मरण की पारंपरिक रीतियों के बीच एक नया विचार जोड़ती है, बल्कि उन अजन्मी बेटियों के प्रति संवेदना व्यक्त करने का एक गंभीर अवसर भी प्रदान करती है, जिन्हें जन्म लेने से पहले ही जीवन से वंचित कर दिया गया। यह अनुष्ठान केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि उन अनगिनत बालिकाओं के प्रति करुणा और पश्चाताप का प्रतीक है, जिनकी किलकारियाँ कभी घर-आँगन में गूँज सकीं और जिन्हें अपना नाम तक नसीब नहीं हुआ। ज्योति भट्ट ने इस संवेदनशील विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। वह पूछती हैं कि जिस समाज में स्त्री को देवी मानकर पूजा जाता है, उसी समाज में बेटियों को जन्म लेने का मौलिक अधिकार क्यों नहीं मिल पाता? यह प्रश्न समाज की दोहरी मानसिकता पर गहरा चिंतन करने के लिए विवश करता है, जहाँ एक ओर नवरात्रि में कन्या पूजन की परंपरा है, वहीं दूसरी ओर गर्भ में ही बेटियों की हत्या का क्रूर सच भी मौजूद है। यह विरोधाभास समाज की संवेदनाओं और वास्तविक व्यवहार के बीच की खाई को उजागर करता है। अजन्मी बेटियों का तर्पण हमें अपनी मान्यताओं, संवेदनाओं और सामाजिक व्यवहार के बीच के अंतर को समझने का अवसर देता है। यह हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है कि हम बेटियों के प्रति अपनी सोच को कब और कैसे बदलेंगे। जब हम अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं, तो यह उन लोगों को याद करने का एक तरीका है जिन्होंने हमें जीवन दिया। लेकिन, यह पहल उन अनगिनत जिंदगियों को भी याद करती है जिन्हें शुरू ही नहीं होने दिया गया। यह उन आत्माओं को श्रद्धांजलि है जो कभी इस दुनिया में आ ही नहीं सकीं। यह आयोजन उन बेटियों के प्रति समाज की जिम्मेदारी पर विचार करने के लिए एक मंच प्रदान करता है, जिन्हें कभी माँ की ममता का अनुभव नहीं हुआ और न ही पिता का स्नेह। उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा, वे न तो किसी की बेटी कहलाईं, न बहन, न पत्नी और न ही माँ। इस तरह के अनुष्ठान समाज को यह याद दिलाते हैं कि हर जीवन अनमोल है, चाहे वह जन्म ले चुका हो या नहीं। यह उन अनगिनत सपनों को भी श्रद्धांजलि है जो कभी पूरे नहीं हो सके। पितृपक्ष में पूर्वजों को जल अर्पित करने की सदियों पुरानी परंपरा के बीच, वाराणसी में अजन्मी बेटियों के तर्पण का यह विचार वास्तव में समाज के अंतर्मन को झकझोरने वाला है। यह आयोजन उन बेटियों के लिए है जिन्हें जन्म से पहले ही मार दिया गया, जिन्हें समाज ने जीने का अवसर ही नहीं दिया। यह एक ऐसी आवाज है जो उन लोगों के लिए चीखती है जो बोल नहीं सकते, उन आत्माओं के लिए जो इस दुनिया में कभी आ ही नहीं सकीं। यह एक प्रतीकात्मक कार्य है जो समाज को उसकी करनी पर विचार करने के लिए मजबूर करता है। इस पहल का उद्देश्य केवल एक रस्म निभाना नहीं है, बल्कि यह उन बेटियों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करने का एक जरिया है, जिन्हें जन्म लेने से पहले ही जीवन से वंचित कर दिया गया। यह समाज को यह संदेश देता है कि हमें कन्या भ्रूण हत्या जैसे गंभीर मुद्दे पर गंभीरता से सोचना चाहिए। यह न केवल एक सामाजिक बुराई है, बल्कि यह हमारे नैतिक और मानवीय मूल्यों पर भी एक गहरा आघात है। समाज को अपनी सोच बदलने की तत्काल आवश्यकता है। ज्योति भट्ट जैसे विचारकों ने इस मुद्दे को उठाकर समाज में जागरूकता फैलाने का सराहनीय कार्य किया है। उनका सवाल सीधा और मार्मिक है: जिस समाज में बेटियों को देवी तुल्य मानकर पूजा जाता है, वहां उन्हें जन्म लेने का अधिकार क्यों नहीं मिलता? यह प्रश्न हमें अपनी संस्कृति, परंपराओं और आधुनिक सोच के बीच के अंतर्विरोधों पर सोचने पर मजबूर करता है। क्या हम केवल दिखावे के लिए बेटियों को पूजते हैं, या वास्तव में उन्हें सम्मान और अधिकार देने को तैयार हैं? जिन बेटियों की किलकारियाँ कभी घर-आँगन में नहीं गूँज सकीं और जिन्हें अपना नाम तक नहीं मिला, उनके प्रति समाज की जिम्मेदारी पर विचार करना आज अत्यंत आवश्यक है। जिस घर में बेटी होती है, वह घर स्वर्ग के समान होता है।




