डिजिटल अभियानों से विरासत और दर्शन की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ी
डिजिटल क्रांति ने भारतीय संस्कृति को भौगोलिक सीमाओं से परे पहुँचाकर उसे वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाई है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जैसे आधुनिक साधनों ने इक्कीसवीं सदी में संचार की परिभाषा ही बदल दी है। इन तकनीकों के माध्यम से भारत की समृद्ध विरासत, दर्शन और कलाएँ दुनिया भर में स्वीकार्यता पा रही हैं। 'अतुल्य भारत', 'देखो अपना देश', 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस जैसे डिजिटल अभियानों ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती दी है। राष्ट्रीय अभिलेखागार (NAI) का 'अभिलेख पटल' पोर्टल ऐतिहासिक दस्तावेजों को जनता और शोधार्थियों के लिए ऑनलाइन उपलब्ध कराता है। वहीं, इग्नका (IGNCA) और गूगल आर्ट्स एंड कल्चर जैसे प्लेटफॉर्म्स मिथिला कला जैसी लोक परंपराओं को संरक्षित कर रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने हम्पी और नालंदा के लिए मोबाइल ऐप लॉन्च कर वर्चुअल टूर की सुविधा दी है, जिससे सांस्कृतिक धरोहर घर-घर तक पहुँच रही है। यूनेस्को की 'दिवे इन्तो हेरितगे' जैसी पहलें भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। डिजिटल संरक्षण और विरासत की सुलभ पहुँच आज की आवश्यकता है। डिजिटल आर्काइव्स, 3द स्कैनिंग और वर्चुअल रियलिटी (VR) जैसी तकनीकें लुप्तप्राय भाषाओं, लोकगीतों और प्राचीन परंपराओं को बचाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। भारत सरकार द्वारा 'जतन (JATAN)' सॉफ्टवेयर के माध्यम से सी-डैक पुणे द्वारा विकसित तकनीक का उपयोग कर देश के 8 प्रमुख राष्ट्रीय संग्रहालयों और एएसआई साइट्स के अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया गया है।




