अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इस भारी उछाल ने दुनिया भर में हाहाकार मचा दिया है, क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतें आम नागरिकों की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट ने इंडोनेशिया, पुर्तगाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और सीरिया जैसे देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इन देशों में ईंधन की कमी, बिजली कटौती और परिवहन हड़तालों ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, जिससे लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में असहनीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। ग्वाटेमाला में स्थिति तब बेकाबू हो गई जब परिवहन कर्मियों और कार्यकर्ताओं ने ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ सड़कों पर उतरकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि तेल की कीमतों को नियंत्रित किया जाए और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम की जाए। इस संकट ने कृषि क्षेत्र को भी बुरी तरह प्रभावित किया है, क्योंकि किसानों को ट्रैक्टर और अन्य कृषि मशीनरी चलाने के लिए डीजल की सख्त जरूरत होती है। ग्वाटेमाला सिटी के पास विला नुएवा की सड़कों पर कारों को आग लगाने की घटनाओं ने इन प्रदर्शनों की उग्रता को जगजाहिर कर दिया। सीरियाई सरकार को भी इस दबाव के चलते पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 40 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी का ऐलान करना पड़ा है। हालांकि जंग के माहौल के कारण सरकार के लिए कीमतें बढ़ाना मजबूरी बन गया था, लेकिन इस कदम ने आम नागरिकों के लिए गुजारा करना असंभव सा बना दिया है। बांग्लादेश में हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से अधिक पेट्रोलियम उत्पाद आयात करता है। ईंधन और एलएनजी की सप्लाई में रुकावट आने के कारण वहां बिजली उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गैस की कमी के चलते कपड़ा फैक्ट्रियों को मजबूरी में डीजल का उपयोग करना पड़ रहा है और लगातार लग रहे बिजली के कटों ने उद्योगों को हिलाकर रख दिया है। बांग्लादेश में लंबे समय तक काम ठप रहने से उत्पादन और फैक्ट्रियों की कमाई पर गहरा बुरा असर पड़ रहा है, जो देश को बड़े आर्थिक संकट की ओर धकेल रहा है। भारत में भी तेल का आयात लगातार महंगा होता जा रहा है, जिसकी पुष्टि पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों से होती है। अप्रैल से अगस्त के दौरान भारत का तेल आयात बिल 48 प्रतिशत की भारी वृद्धि के साथ 74.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस अवधि में 100.7 मिलियन टन तेल का आयात किया गया। हालांकि भारत में कच्चे तेल की कुल मात्रा में मामूली कमी आई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेज होने के कारण आयात बिल में 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। देश की प्रमुख सरकारी मार्केटिंग कंपनियों, जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतें न बढ़ाने के कारण रोजाना लगभग 530 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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वैश्विक ऊर्जा संकट: तेल कीमतों में उछाल से भारत और कई देशों की बढ़ी मुश्किलें
5 अक्टूबर 2026 को 1:16 am बजे

वैश्विक ऊर्जा संकट: तेल कीमतों में उछाल से भारत और कई देशों की बढ़ी मुश्किलें
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