बेंगलुरु में आयोजित धर्मसभा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने विचारों, भावों और प्रवृत्तियों को कर्मों का प्रमुख कारण बताते हुए आत्म-निरीक्षण और शुद्ध आचरण पर जोर दिया, जिससे उपस्थित श्रद्धालुओं ने संयमित एवं सदाचारी जीवन जीने का संकल्प लिया
बेंगलुरु में आयोजित एक धर्मसभा में, निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को आत्म-विशुद्धि, कर्म सिद्धांत और शुद्ध आचरण के मर्म समझाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य के विचार, भाव और प्रवृत्तियां ही उसके कर्मों के आस्रव एवं बंध का प्रमुख कारण बनती हैं। इस अवसर पर मुनिश्री ने मन, वचन और काय की प्रत्येक गतिविधि के प्रति सजग रहने का आह्वान किया, जिससे अंतर्मन की शुद्धता बनी रहे। मुनिश्री ने अपने मंगल प्रवचन में बताया कि शुभ भाव पुण्य कर्म के बंध का कारण बनते हैं, जबकि अशुभ भाव पाप कर्म का कारण होते हैं। इसलिए, आत्मकल्याण के इच्छुक व्यक्ति को केवल बाहरी आचरण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपने अंतर्मन के भावों का भी निरंतर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। यह आत्मनिरीक्षण ही आंतरिक शुद्धि का पहला कदम है, जो व्यक्ति को सही दिशा दिखाता है। उन्होंने विस्तार से समझाया कि कुविचार, छल-कपट, मायाचारी, विषयासक्ति और कुदृष्टि जैसी नकारात्मक भावनाएं आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधक सिद्ध होती हैं। ये विचार व्यक्ति को सही मार्ग से भटकाते हैं और उसकी प्रगति को रोकते हैं। इन दुर्गुणों से मुक्ति पाना आत्मिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन नकारात्मकताओं के विपरीत, मुनिश्री ने सरलता, निष्कपटता, इंद्रिय-संयम, ब्रह्मचर्य तथा मन-वचन-काय की शुद्धता को जीवन को सार्थक दिशा देने वाले प्रमुख गुण बताया। इन गुणों को अपनाने से व्यक्ति न केवल अपने जीवन को एक उद्देश्यपूर्ण दिशा देता है, बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक बल भी प्राप्त करता है। मुनिश्री ने आर्जव धर्म, सत्संग, स्वाध्याय, जिनवाणी चिंतन और देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा को भाव-विशुद्धि का प्रमुख आधार बताया। इन तत्वों के नियमित अनुशीलन से व्यक्ति अपने अंतर्मन को निर्मल बना सकता है और कर्मों के प्रभाव को कम करके आत्मिक उन्नति कर सकता है। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के उपदेशों से प्रेरणा लेते हुए संयमित एवं सदाचारी जीवन जीने का संकल्प लिया।




