पित्र पक्ष में अष्टमी तिथि पर पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। यह श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए होता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुई हो। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो सर्व पित्र अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है। इस साल अष्टमी श्राद्ध 2026 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन पितरों का स्मरण कर तर्पण, पिंडदान और अन्नदान करने की परंपरा है। अष्टमी श्राद्ध के दिन कुछ विशेष पूजा विधियों का पालन किया जाता है। परंपरा के अनुसार, पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठना चाहिए। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर पितरों को स्मरण करते हुए श्राद्ध करने का संकल्प लेना होता है। इसके बाद, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, काले तिल मिले जल से पितरों को तर्पण करना चाहिए। परिवार की परंपराओं के अनुसार तर्पण विधि का पालन करना उचित होता है। श्राद्ध कर्मों के बाद पंचबली का विधान है, जिसमें गाय, कुत्ते और कौवे जैसे जीवों के लिए भोजन निकालना शामिल है। इसके अतिरिक्त, अतिथियों को भोजन कराना भी पंचबली का हिस्सा माना जाता है। इसके बाद, योग्य ब्राह्मणों या जरूरतमंद गरीबों को सात्विक भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दी जाती है। हिंदू धर्म में इस दिन अन्नदान को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। अष्टमी श्राद्ध के दिन कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सलाह दी जाती है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस दिन नारियल का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे बुद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसी तरह, तिल के तेल का उपयोग, चाहे वह भोजन में हो या शरीर पर लगाने के लिए, वर्जित माना जाता है। खास तौर पर, उपवास रखने वाले या विशेष पूजा करने वाले लोगों को तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। इसमें लहसुन, प्याज, मांसाहार और शराब जैसी चीजों का सेवन शामिल है। पितृ पक्ष में श्रद्धा और नियमों के साथ समय बिताना महत्वपूर्ण माना जाता है।
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अष्टमी श्राद्ध: पितरों की शांति के लिए करें कर्म
4 अक्टूबर 2026 को 12:01 am बजे



