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कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति या पत्नी द्वारा केवल कानूनी कार्यवाही दायर करना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं है, बशर्ते ऐसे कदम उठाने के लिए उचित और वैध आधार मौजूद हों। जस्टिस डीके सिंह और जस्टिस एच शांति भूषण की खंडपीठ ने तुमकुरु की पारिवारिक अदालत के अप्रैल 2019 के उस आदेश को रद्द कर यह टिप्पणी की, जिसने वैवाहिक अधिकारों की बहाली की मांग करने वाली एक पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया था। पारिवारिक अदालत ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया था कि पत्नी द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत आपराधिक कार्यवाही, भरण-पोषण का दावा और संपत्ति के बंटवारे का मुकदमा दायर करने से इतनी शत्रुता पैदा हो गई थी कि पति का अलग रहना जायज था। हाई कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को वैवाहिक न्यायशास्त्र का बुनियादी दुरुपयोग बताया। मामले के अनुसार, 1996 में शादी करने वाले इस जोड़े के दो बेटे हैं। पत्नी ने आरोप लगाया था कि हाई स्कूल में शिक्षक पति ने अपने एक छात्र के साथ संबंध बनाए और मार्च 2010 में परिवार को छोड़ दिया। उसने बच्चों की खातिर सुलह की कोशिश की, लेकिन पति अलग रहने पर अड़ा रहा और अंततः तलाक के लिए अदालत गया, जिसमें पत्नी द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्यवाही को क्रूरता का आधार बताया गया। पति ने दावा किया कि पत्नी और उसके परिवार ने उस पर हमला किया था। हालांकि, खंडपीठ ने पाया कि पत्नी ने परिवार की गरिमा और बेटों के कल्याण के लिए अतीत को माफ करके रिश्ते को बहाल करने की लगातार इच्छा जाहिर की थी।
पति के इस तर्क को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि पत्नी और उसके परिवार ने उस पर हमला किया था। रिकॉर्ड में ऐसे किसी हमले का कोई सबूत नहीं मिला, जिससे पति का यह दावा निराधार साबित हुआ। अदालत ने पाया कि पति ही वह पक्ष था जिसने वैवाहिक संबंधों को तोड़ा था। फैसले में यह भी कहा गया कि पारिवारिक अदालत ने पत्नी की याचिका को खारिज करते समय वैवाहिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों का सही ढंग से पालन नहीं किया। पति द्वारा अलग रहने के फैसले को पत्नी द्वारा की गई कानूनी कार्यवाहियों का परिणाम बताना गलत था। अदालत ने पति को पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की राशि का भुगतान करने का भी निर्देश दिया, जो उसने बंद कर दिया था। यह राशि परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक थी। पति को अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। यह निर्णय उन महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत है जो घरेलू हिंसा या पति द्वारा छोड़े जाने के बाद न्याय के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाती हैं। यह फैसला उन्हें यह आश्वासन देता है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी कार्यवाही करना क्रूरता नहीं माना जाएगा। कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को ऐसे मामलों में दोनों पक्षों के आचरण का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए। केवल एक पक्ष के दावों को सुनकर फैसला नहीं सुनाया जाना चाहिए। सभी सबूतों और परिस्थितियों पर विचार करना आवश्यक है।
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