विपक्ष के बिखराव और आपसी खींचतान के बावजूद सरकार न तो सदन चला पाई और न ही सामने से उठ रहे सवालों के संतोषजनक उत्तर दे पाई
क्या नरेंद्र मोदी सचमुच घिर गए हैं? विपक्ष के बिखराव के बावजूद सरकार सवालों के जवाब नहीं दे पाई, जिससे यह सवाल उठा है
राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक सवाल बार-बार गूंज रहा है: क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सचमुच घिर गए हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और विपक्ष की एकजुटता ने एक नई बहस छेड़ दी है। हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और उनकी पार्टी, भाजपा, की ताकत को कम आंकना नासमझी होगी। अपने 25 सालों के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने एक ऐसी राजनीतिक जमीन तैयार की है, जिस पर खड़े होकर वे विरोधियों के हर वार का सामना करने में सक्षम हैं। उन्होंने न केवल संगठन और सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत रखी है, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति का निर्माण किया है जो उन्हें विचार से भी बड़ा बना चुकी है। भाजपा अब केवल एक पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ऐसा संगठन बन गया है जिसका अभूतपूर्व भौगोलिक और सामाजिक विस्तार हुआ है। इसी विस्तार के भरोसे पार्टी तीन बार केंद्रीय सत्ता में काबिज हुई, जिसमें दो बार पूर्ण बहुमत मिला और तीसरी बार भी सहयोगियों के साथ सरकार बनाई। सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद, मुख्य प्रतिद्वंदी दल कांग्रेस 100 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर सका। इस चुनाव परिणाम ने विपक्ष को यह भरोसा तो दिलाया कि भाजपा के अश्वमेघ के रथ को रोका जा सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मोदी और भाजपा के संगठन का मुकाबला करने की स्थिति में फिलहाल कोई दल या राजनीतिक समूह नहीं है। बंगाल की जीत ने भाजपा के काडर में नया आत्मविश्वास भरा है। अल्पमत की सरकार होने के बावजूद, केंद्र की सरकार पूरी तरह से भरोसे से भरी हुई है और बड़े फैसले ले रही है। असम की जीत इस भरोसे को और मजबूत करती है। अब पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव मैदान में भाजपा को यह साबित करना है कि वह अभी थकी नहीं है। पंजाब में कमजोर स्थिति के बावजूद, जिस तरह से भाजपा मैदान में उतरी है, वह उसके अकारण भरोसे को साबित करती है। यह सच है कि नई नवेली आम आदमी पार्टी पंजाब में दूसरी बार सरकार बना सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा ऐसे सपने नहीं देख सकती। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में, भाजपा के पास योगी आदित्यनाथ जैसा फायर ब्रांड नेता है, जिसके पास 10 सालों का सुनहरा अतीत है। सरकार के नेता पर कोई दाग नहीं है, अपराधियों पर लगाम कसी गई है, और अर्थव्यवस्था अधिशेष की स्थिति में है। इसका मतलब है कि उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ बदल गया है। इन सकारात्मक बदलावों के बावजूद, नरेंद्र मोदी को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। कई जातीय समूह उन पर हमलावर हैं, खासकर आरक्षण जैसे मुद्दों पर। यह एक ऐसा विषय है जिस पर राजनीतिक दलों की आम सहमति है और कोई भी दल इसे आसानी से छू नहीं सकता। मोदी इस समय निशाने पर हैं, और यह जंग ज्यादातर ऑनलाइन माध्यमों पर लड़ी जा रही है, लेकिन इसका जहर समाज में फैल रहा है। हाल ही में यूजीसी गाइडलाइंस ने एक नई समस्या खड़ी कर दी, जिससे मोदी विरोधियों को आग उगलने का मौका मिला। सौभाग्य से, सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रावधानों को रोककर सरकार की लाज बचा ली। सामाजिक समरसता के लिए ऐसे विवाद घातक हैं, लेकिन जब राजनीति का लक्ष्य समाज को बांटकर ही साधने का हो तो क्या किया जा सकता है? इसके अतिरिक्त, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लंबे समय तक झेलना भी सरकार के खिलाफ गया। अंततः, प्रधान अनावश्यक राजनीति के शिकार होकर विदा हो गए, जिससे गुमनाम 'काक्रोच जनता पार्टी' अनावश्यक चर्चा में आ गई। इन सबके बावजूद, मोदी और भाजपा की शक्ति को कम आंकना एक बड़ी भूल होगी। योगी आदित्यनाथ, हेमंत विश्वशर्मा, शुभेंदु अधिकारी, मोहन यादव, विष्णुदेव साय, नायब सिंह सैनी, मोहन मांझी, देवेंद्र फड़नवीस, और सम्राट चौधरी जैसे मुख्यमंत्रियों की टीम को कम आंकना नासमझी होगी। नरेंद्र मोदी ने देश के हर क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक समूहों के नेताओं की एक पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी है। भाजपा के इस सामाजिक विस्तार को समझे बिना, मोदी की ताकत को समझना असंभव है। इसी तरह, भाजपा का भौगोलिक विस्तार भी अप्रतिम है। भाजपा ने 'मोदी समय' में जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक लोकसभा सीटें जीती हैं। भुवनेश्वर से लेकर मुंबई तक, भाजपा की तूती बोल रही है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के अथक प्रयासों के बावजूद, मोदी देश की जनता की पहली पसंद बने हुए हैं। सरकार के विरुद्ध असंतोष को वे कैसे समाप्त करते हैं, इसकी पहली बड़ी परीक्षा उत्तर प्रदेश के चुनाव मैदान में होनी है। वहां के परिणाम देश की राजनीति की भावी दिशा तय करेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। कई विश्लेषक और ज्योतिष गुरु नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति भवन भेजने और किसी अन्य को प्रधानमंत्री बनाने की जुगत में लगे हैं। हालांकि, ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा स्वयं को अधिक आश्वस्त पाती है। प्रधानमंत्री की सक्रियता और दिनचर्या को देखते हुए, यह कहना कठिन है कि वे आसानी से हार मान लेंगे। संगठन और सरकार पर उनकी पकड़ मजबूत है। आज तक, विपक्षी दलों के व्यापक विरोध से ही उन्होंने शक्ति अर्जित की है। नए समय में हो रहा विरोध क्या उन्हें फिर से शक्तिमान बनाएगा, यह तो उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के परिणामों का इंतजार करने पर ही पता चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 25 सालों के सत्ताकाल में एक ऐसी छवि अर्जित की है, जिसे 'मोदी की गारंटी' कहा गया। यही विचार था जिसने मोदी को संगठन और विचार से भी बड़ा बना दिया। आज मोदी एक विचार बन चुके हैं - सबको साथ लेकर इस देश को विकसित भारत बनाने का सपना। इस मायने में, वे सपनों के सौदागर भी हैं। 'अच्छे दिन आने वाले हैं' से लेकर 'सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास, सबका विश्वास' तक, यह निरंतरता दिखती है। यह एक बिल्कुल नई राजनीतिक संस्कृति है और उसका सतत विकास है। ऐसा लगता है कि सुशासन, विकास और संवाद - इन तीन स्तरों से सत्ता ने सब कुछ साध लिया है। आलोचना हर सरकार की होती है, और होनी भी चाहिए, क्योंकि कहीं भी कुछ भी पूर्ण नहीं होता। लेकिन दिल्ली में 2014 के बाद आई सरकार ने न केवल अपनी धाक जमाई, बल्कि एक बदलते हुए हिंदुस्तान का भी परिचय कराया। यह एक अलग ही हिंदुस्तान था, जो आकांक्षाओं से भरा था और अवसाद की चादर को फेंक कर कुछ करना चाहता था, आगे बढ़ना चाहता था। मोदी ने राजनीतिक तंत्र और नेताओं की इज्जत थोड़ी बढ़ाई है। इसके पूर्व का समय याद करें तो वह 'नीतिगत जड़ता' का समय था, घोटालों की खबरों से परेशान देश भ्रष्टाचार के विरुद्ध सड़कों पर था। दिल्ली में एक नई बनी पार्टी (आप) सत्ता में आ चुकी थी। तभी मोदी उम्मीदों के चेहरे बनकर उभरे और लोगों ने उनमें राष्ट्रनायक की छवि देखी। उनका साधारण अतीत यह भरोसा दे रहा था कि वे लोगों के दर्द समझते हैं और संकटों के ठोस और वाजिब हल निकालेंगे। इस भरोसे ने तीन बार उन्हें केंद्र की सत्ता पर न केवल बिठाया, बल्कि तमाम राज्यों में भी भाजपा और राजग की सरकारें बनीं, जिन्हें 'डबल इंजन की सरकार' कहकर संबोधित किया गया। गुजरात और दिल्ली के 'सत्ता साकेत' में लगभग ढाई दशक पूरे कर चुके नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को लेकर इस समय विपक्ष और समाज के कुछ हिस्से हमलावर हैं। कुछ मुद्दे तो उनकी अपनी सरकार ने दिए, तो कुछ विपक्ष प्रायोजित विवाद भी हैं। इन विवादास्पद मुद्दों में पेपर लीक, एनटीए की नाकामी, इथेनॉल नीति और चुनाव आयोग से जुड़े मामले शामिल हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्होंने सरकार की छवि पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष इन मुद्दों को भुनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन क्या वे मोदी के चक्रव्यूह को भेद पाएंगे, यह देखना बाकी है। निश्चित रूप से, विपक्ष के बिखराव और आपसी खींचतान के बावजूद, सरकार न तो सदन चला पाई और न ही सामने से उठ रहे सवालों के संतोषजनक उत्तर दे पाई। यह स्थिति सरकार के लिए एक चुनौती पेश करती है। यह सच है कि कई बार अति आत्मविश्वास नुकसानदायक साबित होता है।




