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वॉशिंगटन: अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूची की जांच को लेकर राजनीतिक विवाद गरमा गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि रिपब्लिकन पार्टी के शासन वाले 26 राज्यों में करीब 2 लाख भारतीय मूल के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। हालांकि, इस चौंकाने वाले आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो बड़ी संख्या में योग्य मतदाताओं के नाम हटने का असर कुछ राज्यों में चुनावी मुकाबले पर पड़ सकता है। अमेरिकी मतदाता सूची से नाम हटने का यह मुद्दा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती पेश कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करता रहा है। अमेरिका में करीब 21 लाख भारतीय मूल के मतदाता होने का अनुमान है। वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक, लगभग 65 प्रतिशत भारतीय अमेरिकी मतदाताओं ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कमला हैरिस का समर्थन किया था। इस पृष्ठभूमि में, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की यह खबर चुनावी निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी मतदाता का नाम सूची से हटने के दावे और वास्तव में किसी योग्य मतदाता को मतदान से वंचित किए जाने के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। मतदाता सूची की जांच प्रक्रिया में मृत मतदाताओं, स्थान बदल चुके लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य अपात्र नामों की पहचान करने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, सूची से नाम हटने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति विदेशी नागरिक है या उसने गलत तरीके से मतदान का अधिकार हासिल किया था। अमेरिका में भारत की तरह कोई केंद्रीय निर्वाचन आयोग नहीं है। वहां चुनावों के संचालन और मतदाता पंजीकरण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास होती है। इसलिए, मतदाता सूची की जांच, पहचान संबंधी दस्तावेजों और नाम हटाने की प्रक्रिया के नियम अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकते हैं। इस वजह से, नाम हटाने के सटीक कारणों, संबंधित राज्यों के रिकॉर्ड और प्रभावित मतदाताओं की पात्रता की पुष्टि के बिना इसके राजनीतिक प्रभाव का सटीक आकलन करना संभव नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप मतदाता पंजीकरण और पहचान की जांच सख्त करने की वकालत कर रहे हैं। इसी उद्देश्य से वह 'सेव अमेरिका एक्ट' का समर्थन कर रहे हैं। इस प्रस्तावित व्यवस्था के तहत मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए अमेरिकी नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज, जैसे पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र, प्रस्तुत करने की आवश्यकता हो सकती है। मतदान के दौरान पहचान सत्यापन के नियमों को भी सख्त करने का प्रस्ताव है। समर्थकों का कहना है कि इससे चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा बढ़ेगी और अपात्र लोगों के पंजीकरण को रोका जा सकेगा। वहीं, इन प्रस्तावित बदलावों के विरोधियों का तर्क है कि दस्तावेजों की अनिवार्यता उन योग्य अमेरिकी नागरिकों के लिए भी मुश्किल पैदा कर सकती है, जिनके पास आवश्यक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ट्रंप पहले भी अमेरिकी चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगाते रहे हैं, हालांकि, व्यापक चुनावी धोखाधड़ी के दावों के समर्थन में निर्णायक सबूत सामने नहीं आए हैं। ब्रेनन सेंटर फॉर जस्टिस के शोध में भी जांचे गए चुनावों में मतदाता धोखाधड़ी की घटनाएं बेहद कम पाई गई हैं। कांग्रेस में बहुमत बचाना ट्रंप के लिए अहम है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के चार वर्षीय कार्यकाल के बीच में होते हैं। इस बार प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 35 सीटों पर चुनाव होना है। रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
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