बेंगलुरु में एक धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने कहा कि भगवान के दर्शन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर उन्मुख करना है। उन्होंने 7 अक्टूबर, 2026 को श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि ‘जिन दर्शन’ केवल प्रतिमा को निहारना मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्मा के शुद्ध स्वरूप की पहचान है। मुनि ने जैन दर्शन के सात तत्वों—जीव, अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष—की विस्तृत व्याख्या करते हुए बताया कि इनके क्रमशः चिंतन से श्रद्धालु जीव के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है। मुनि वीरसागर ने स्पष्ट किया कि जीव आत्मा के शुद्ध स्वरूप का बोध कराता है, जबकि अजीव कर्म पुद्गल सहित जड़ द्रव्यों की वास्तविकता को समझाता है। उन्होंने मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों तथा कषायों के कारण कर्मों का आत्मा की ओर आना आश्रव बताया। इसी प्रकार, कर्मों का आत्मा से जुड़ना बंध, नए कर्मों के आगमन को रोकना संवर, पूर्वबद्ध कर्मों का क्षय निर्जरा और समस्त कर्मों से पूर्ण मुक्ति को मोक्ष कहा। उन्होंने यह भी कहा कि सम्यक दर्शन का आधार हेय और उपादेय का सही विवेक है, जिसका अर्थ है कि क्या त्यागना योग्य है और क्या ग्रहण करना योग्य है, इसका स्पष्ट ज्ञान होना। उन्होंने आगे कहा कि राग-द्वेष और कषाय जैसी भावनाएं त्यागने योग्य हैं, क्योंकि ये आत्मा की प्रगति में बाधक बनती हैं। इसके विपरीत, वीतराग भगवान का मार्ग आत्मकल्याण का मार्ग है, जो आत्मा को उसके शुद्धतम स्वरूप की ओर ले जाता है। मुनि ने इस बात पर जोर दिया कि जिन दर्शन के माध्यम से मनुष्य में सही श्रद्धा और जीवन-दृष्टि विकसित होती है, जो उसे जीवन की चुनौतियों का सामना करने और आत्मिक उन्नति करने में सहायक होती है। परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य एवं पूज्य आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज के आशीर्वाद से आयोजित इस धर्मसभा में मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मंदिर में भगवान की प्रतिमा के दर्शन करते समय, दृष्टि केवल पाषाण या धातु की उस आकृति पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके माध्यम से वीतराग परमात्मा के शुद्ध स्वरूप और उनके अनंत गुणों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मुनि ने श्रद्धालुओं से कहा कि प्रतिदिन होने वाले भगवान के दर्शन में भी आंतरिक नवीनता लाई जा सकती है। इसका अर्थ है कि हर बार दर्शन करते समय एक नई चेतना और नए भाव के साथ भगवान के प्रति अपने समर्पण को व्यक्त करना। यह केवल एक नियमित क्रिया नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हर बार एक नया आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करने वाली होनी चाहिए। उन्होंने साधना को अधिक सार्थक बनाने के तरीकों पर भी प्रकाश डाला। मुनि ने सुझाव दिया कि नए तीर्थों की वंदना, पूजन-जाप में विविधता लाना और जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों को आत्मशुद्धि और प्रभु-स्मरण का अवसर बनाकर आध्यात्मिक प्रगति की जा सकती है। इन उपायों से व्यक्ति अपनी साधना को अधिक गहराई और प्रभावशीलता प्रदान कर सकता है। तत्वार्थ श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्’—इस सूत्र का उल्लेख करते हुए मुनि ने समझाया कि तत्वों के यथार्थ स्वरूप में श्रद्धा ही सम्यक दर्शन है। यह श्रद्धा व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने और आत्मिक विकास करने के लिए प्रेरित करती है।
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जिन दर्शन आत्मा के शुद्ध स्वरूप की पहचान है: मुनि वीरसागर
8 अक्टूबर 2026 को 12:19 am बजे

जिन दर्शन आत्मा के शुद्ध स्वरूप की पहचान है: मुनि वीरसागर
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