डॉक्टरों की आत्महत्या के मामले चिंताजनक, लंबी ड्यूटी और तनाव मुख्य कारण
देश के मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा संस्थानों में छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों द्वारा आत्महत्या के बढ़ते मामले चिंताजनक हैं। 11 मेडिकल कॉलेजों के 12 पीजी रेजिडेंट, जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने मार्च से 24 सितंबर के बीच आत्महत्या की। यह कड़वी सच्चाई दर्शाती है कि जीवन बचाने वाले ही जीवन से हार मान रहे हैं, जो हमारी चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। लंबी ड्यूटी, पढ़ाई का दबाव और रैगिंग जैसी परिस्थितियां इन त्रासदियों के पीछे छिपी हैं। रेजिडेंट डॉक्टरों पर हुए एक अध्ययन में बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने नींद पूरी न होने, लगातार लंबी ड्यूटी और अत्यधिक तनाव की शिकायत की। कुछ ने आत्महत्या के विचार आने की बात भी स्वीकार की। ये आंकड़े महज आंकड़े नहीं हैं; ये हमारी चिकित्सा व्यवस्था के लिए चेतावनी हैं। यह समस्या नई नहीं है। लगभग दो दशक पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल चिकित्सालय में मेरे पिता के इलाज के दौरान मुझे स्वयं एक रेजिडेंट के अत्यधिक तनाव और चिड़चिड़े व्यवहार का अनुभव हुआ। बाद में बातचीत से पता चला कि रेजिडेंट डॉक्टरों की लगातार 25-30 घंटे तक ड्यूटी सामान्य बात मानी जाती थी। आज इतने वर्षों बाद भी यदि वही प्रश्न हमारे सामने खड़ा है, तो हमें ठहरकर सोचना होगा कि चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की कार्य-संस्कृति में वास्तविक परिवर्तन कितना आया है। चिकित्सकों के सामने चुनौती केवल लंबी ड्यूटी तक सीमित नहीं है। वे प्रतिदिन बीमारी, पीड़ा और मृत्यु से रूबरू होते हैं। गंभीर मरीजों की स्थिति, मरीज की मृत्यु, परिजनों का आक्रोश, संसाधनों की कमी और उपचार से जुड़े कठिन निर्णय उनके मानसिक संसार पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इसे केवल ‘प्रोफेशनल ड्यूटी’ कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। हमारे यहां अक्सर कहा जाता है कि को मजबूत होना चाहिए। निस्संदेह चिकित्सक में कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने, भावनात्मक संतुलन बनाए रखने और आपात स्थिति में नेतृत्व करने की क्षमता होनी चाहिए। लेकिन मजबूत होने का अर्थ यह नहीं कि उसे थकान, तनाव, भय या मानसिक पीड़ा महसूस करने का अधिकार ही न हो। भी मनुष्य है। उसे भी पर्याप्त नींद, विश्राम, सम्मान, संवाद और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग और संबंधित संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियम एवं प्रावधान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असली चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नियमों की संख्या से नहीं, बल्कि उन नियमों के जमीन पर उतरने से तय होती है।



