सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने विभिन्न मामलों में यह व्याख्या करते हुए कहा है कि पुलिस अधिकारियों को यह जानकारी आरोपी की भाषा में और जितनी जल्दी हो सके, देनी होगी। नियमों का उल्लंघन करने पर गिरफ्तारी को अवैध माना जाएगा। यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत दिए गए हैं, जो हर नागरिक को गिरफ्तारी के कारणों को जानने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रबीर पुरकायस्थ' (2024) और 'मिहिर राजेश शाह' (2025) जैसे मामलों में इस सिद्धांत को स्थापित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून चाहे जो भी हो, गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना देना सभी अपराधों में अनिवार्य है। यदि यह जानकारी गिरफ्तारी के बाद जल्द से जल्द नहीं दी जाती, तो विशेष रूप से मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने से दो घंटे पहले लिखित में देना आवश्यक है। यदि इन निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है, तो गिरफ्तारी स्वतः ही अवैध मानी जाएगी और आरोपी को रिहा कर दिया जाएगा। 'विहान कुमार' (2025) प्रकरण में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम सभी प्रकार के अपराधों पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वह गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत हो या भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत। हाल ही में 'जसकरण जीत सिंह देओल' (2026) प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम के उल्लंघन पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना नहीं दी गई थी। इसके परिणामस्वरूप, कोर्ट ने लापरवाह पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए और कहा कि आपराधिक कार्यवाही को दूसरे विवेचक को हस्तांतरित किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के आधारों की सूचना न देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, इसलिए उच्च न्यायालय आरोपी को उचित मुआवजा भी प्रदान कर सकता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पुलिस अधिकारी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी से करें, वरिष्ठ अधिकारियों को इस पर विशेष निगरानी रखनी होगी। पुलिस अधिकारियों को इस विषय पर पर्याप्त प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है।
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गिरफ्तारी के आधार लिखित में देना मौलिक अधिकार
4 अक्टूबर 2026 को 12:00 am बजे



