मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने कहा कि मन, वचन और काय से किसी के प्रति दुर्भावना से मुक्त रहना ही वास्तविक अहिंसा है, जो आज के समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है
बेंगलुरु में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर पूज्य निर्यापक श्रमण श्री 108 वीरसागर जी महाराज के सानिध्य में एक विशेष आध्यात्मिक सत्संग का आयोजन किया गया। इस दौरान मुनि ने अहिंसा के आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के अशांत विश्व में भगवान महावीर और महात्मा गांधी का अहिंसा संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। मुनि ने स्पष्ट किया कि अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक कष्ट न देना नहीं है, बल्कि मन, वचन और काय—तीनों स्तरों पर किसी के प्रति दुर्भावना से मुक्त रहना ही वास्तविक अहिंसा है। कटु विचार, कठोर वाणी और द्वेषपूर्ण व्यवहार भी हिंसा के सूक्ष्म रूप हैं, जिनसे बचना आवश्यक है। मुनि ने आधुनिक समाज में बढ़ती मानसिक अशांति, तनाव और वैचारिक संघर्ष पर गहरी चिंता व्यक्त की।




